मेरे गाँव की मिट्टी की खुशबू अब भी मेरे तन में है

मेरे गाँव की मिट्टी की खुशबू अब भी मेरे तन में है 
रस्मों -रिवाजों की अदब अब भी मेरे मन में है । 
मैं दूर हूं लेकिन ह्रदय मेरा वहीं पर है रमा 
पुरखों के मेरे कीर्ति की पूंजी वहीं पर है जमा । 
गाँव में नित ही मिला है स्नेह भी, सत्कार भी 
गाते हैं मिल कर के सभी फगुआ, मधुर मल्हार भी ।
कानों में मेरे गूंजती है आज भी सोहर की धुन
दिल मेरा है नाचता करताल की झंकार सुन ।
मत रोकिए मुझको यहाँ अब काव्य के इस मंच पर
है जिक्र मेरे गाँव का बस चल गया तो चल गया ।।


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